अनुसूचित जनजाति के बदलते प्रतिमान एवं अनुसूचित क्षेत्रों में संचालित योजनाएँ

(जिला: जाँजगीर-चाम्पा के ग्राम पेण्ड्री सबरिया जनजाति के विशेष संदर्भ मंे)

 

Dr. (Mrs.) Vrinda Sengupta1*, Ku. Vandana Panday2, Jitendra Dewangan3

1Asstt.Prof. (Sociology), Deptt.of Sociology, Govt.T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.)

2Asstt. Prof., Govt.T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.)

3Student, Govt.T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.)

*Corresponding Author E-mail:

 

सारांश- 

किसी भी क्षेत्र या जाति के विकास में उनकी प्रतिमान संचालित योजनाएँ एवं जनाँकिकीय विशेषताएँ महत्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि उसी के आधार पर शासकीय नीतियाँ तैयार की जाती है। छ.. की जनसंख्या का 2001 में 31.76 प्रतिशत् अनुसूचित जनजाति है। ये जनजातियाँ मुख्यतः कोरिया, जाँजगीर-चाम्पा, सरगुजा, जशपुर, रायगढ़, बस्तर, दंतेवाड़ा, काँकेर, नारायणपुर, बीजापुर आदि जिलों में रहते हैं। ये जनजातियाँ रूढ़ियों एवं परम्पराओं से बँधे होते हैं। इन्हें विकास की धारा से जोड़ना आसान कार्य नहीं है। इन जनजातियों में मुख्य गोंड़, कँवर, कोरवा, बिरहोट, उराँव, खैरवार, बिंझवार, कंमार, खांड़िया, मुड़िया, पटवा, हलवा, अबुझमाड़िया, सबरिया प्रमुख हैं। ये जनजातियाँ मुख्यतः स्त्री साक्षरता में पिछड़े हुए हैं। इनकी 89.2 प्रतिशत् जनसंख्या काश्तकार एवं कृषि में संलग्न हैं, जो काफी पिछड़े हुए हैं। राज्य के विकास के लिए आवश्यक है कि इन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जाए। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत सरकार ने जनजातियों की सभ्यता एवं संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए विकास योजनाएँ क्रियान्वित किए हैं इन योजनाओं के फलस्वरूप जनजातियों का आर्थिक विकास तेज गति से हुआ है। जाँजगीर-चाम्पा जिला में निवासरत् सबरिया जनजाति की अपनी विशेषता है जनजाति समाज आज बदलाव के दौर से गुजर रहा है।

 

 

प्रस्तावना

Ÿाीसगढ़ जनजाति बहुल राज्य है। दुर्गम एवं दूरस्थ स्थान में निवास करने वाले ऐसे समूह को जनजाति कहा जाता है, जिनका विशिष्ट नाम, साँस्कृतिक एवं आर्थिक आधार होता है।ऐसे जनजाति जिन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत सूचीबद्ध किया गया है।

 

अनुसूचित जनजाति कहलाते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत् राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह किसी भी जनजाति समूह को अनुसूचित घोषित कर सकता है। छ.. में अनुसूचित जनजाति समूह की घोषित संख्या 42 हैं प्रदेश में 2001 की जनगणना के अनुसार जनजातियों की मूल जनसंख्या 66.16 लाख है जो प्रदेश कुल जनसंख्या का 31.76 प्रतिशत् है।

 

शोध अध्ययन का महत्व:

..अंचल जनजाति बाहुल्य है। इस अंचल की जनजातियों पर शोध कार्य हुआ है। इसी अंचल की सबरिया जनजाति से संबंधित इस शोध कार्य का महत्व इस प्रकार है:-

1.   सबरिया जनजाति के विषय में कोई प्रमाणिक जानकारी इस शोध के पूर्व तक उपलब्ध नहीं रही।

 

2.   .. के जनजातीय मानचित्र पर यद्यपि खारिया आदिवासियों की उपस्थिति तुलनात्मक रूप मंे अल्प

 

3.   अल्प संख्या में होने के कारण सबरिया आदिवासी सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से अन्य जनजातियों के साथ सहयोग करने के लिए बाधा है।

 

4.   जीवन निर्वाह के लिए सबरिया आदिवासियों ने निर्माण कार्यों हेतु भूमि की खुदाई का कार्य अपना लिया

 

5.   यह अध्ययन सबरिया जनजाति के पारम्परिक जीवन, उनमें घटित हो रहे परिवर्तनों तथा इन परिवर्तनों के कारण इस जनजाति के भविष्य के विषय में जानकारी प्रस्तुत करता है।

विकास की योजनाओं में संशोधन परिवर्तन करने में सहायता मिल सकती है।

 

6.   गहन सर्वेक्षण पर आधारित तथा पक्षपात और पूर्वाग्रह से मुक्त होने के कारण इस अध्ययन से आदिवासियों की यथार्थ समस्याओं पर प्रकाश पड़ता है।

 

7.   साथ ही इन समस्याओं के निराकरण के लिए किस प्रकार के प्रयास अपेक्षित है। इसका मार्गदर्शन भी इस अध्ययन से हो सकता है।

 

8.   यह अध्ययन, आदिवासी समाज में घटित हो रहे परिवर्तनों, उनके कारणों और परिणामों पर प्रकाश डालता है।

 

9.   वृहद् भारतीय समाज के साथ आदिवासियों के समीकरण के मार्ग में क्या बाधाएँ है तथा उन्हें किस प्रकार दूर किया जा सकता है। इस विषय में जानकारी इस शोध से प्राप्त होती है।

 

अध्ययनों की समीक्षा:

सबरिया छ.. की एक लघु जनजाति है जो कि छŸाीसगढ़ के वन्याँचल एवं ग्रामों में रह रही है। वे मूलतः छोटा नागपुर के मुण्डा जनजाति समूह के अंतर्गत आते हैं। इतिहास के अविदित काल में वे छोटा नागपुर से प्रवजित होकर छ.. के विषय में महत्वपूर्ण उल्लेख आर.वी.रसल और रायबहादुर आॅफ द सेन्ट्रल प्राॅविन्सेस आॅफ इण्डिया1 में मिलता है। ए.बी. बर्ट प्रेडले2 की पुस्तक स्टोरी आॅफ इण्डियन अपलैण्ड छोटा नागपुर का अध्ययन भी इस दृष्टि से किया गया कि इसमें सम्भवतः सबरिया जनजाति के विषय में कुल सामग्री मिल जाए। परन्तु इसमें छोटा नागपुर पठार का भौगोलिक विवरण मात्र है। टी.सी. दास3 का एक शोध पत्र द वाइल्ड खारियान आॅफ दलभूम में ऐसी कोई सामग्री प्राप्त नहीं हुई, जिसमें किसी प्रकार का मार्गदर्शन अथवा सहायता प्रस्तुत अध्ययन के लिए मिल पाती। सर हर्बर्ट रजले4 की पुस्तक ट्राइब्स एण्ड कास्ट्ंस आॅफ बंगाल में सबरिया आदिवासियों पर एक आलेख है। इस आलेख में शोधोपयोगी कोई उल्लेखनीय सामग्री नहीं मिल पाई। अतः प्रस्तुत शोध छ.. के सबरिया जनजाति के विषय में प्रथम शोध छ.. के सबरिया जनजाति के विषय में प्रथम शोध है।

 

1ण्  त्नेमससए त्ण्टण् ंदक भ्ममतंसंस त्ंप ठंींकनत. ज्ीम ज्तपइमे ंदक बंेजमे व िजीम बमदजतंस चतवअपदबमे व िप्दकपंए डंबउपससंद ंदक ब्वण् स्जकण् स्वदकवदए 1916

 

2ण्  ठतंकसमल थ्ण्ठण्. ैजवतल व िंद प्दकपंद न्चसंदकए ब्ीीवजं छंहचनत ।ण् स्पजजसम ादवूद     च्तवअपदबम व िजीम म्उचपतमए ैउपजी मसकमत ंदक बवण् स्वदकवदए 1903

 

3ण्  क्ंेए ज्ण्ब्ण् . ज्ीम ूपसक ैंइंतपंे व िक्ंसइीवउए ।दजीतवचवसवहपबंस चंचमते अकण्प्प्प्    न्दपअमतेपजल व िब्ंसबनजजंए 1931

 

4ण्  त्पेसमलए भ्ण्भ्ण्. ज्ीम ज्तपइमे ंदक बंेजमे व िठमदहंसए ठमदहंस ैमबतमजंतपंज च्तमेे ब्ंसबनजजंए 1891

 

अध्ययन का उद्देश्य:

1.   राज्य की अनुसूचित जनजातियों की संख्या ज्ञात करना है।

 

2.   अनुसूचित जनजातियों की विकास में बाधक तत्वों को ज्ञात करना एवं दूर करने हेतु सुझाव देना है।

 

3.   सबरिया जनजाति के सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य, शिक्षा, साँस्कृतिक जीवन में घटित परिवर्तनों, उनके कारणों तथ परिणामों का अध्ययन करना।

 

4.   सबरिया जनजाति में परिलक्षित परिवर्तनों की दिशा क्या है तथा इसके फलस्वरूप सबरिया जनजाति समाज का भावी स्वरूप कैसा होगा, यह ज्ञात करना।

 

उप कल्पना:

1.   दीर्घकाल से अन्य जनजातियाँ (उराँव, धाँगड़ा, कँवर, बिंझवार, गोंड़) के साथ रहने के कारण अध्ययन के लिए चयनित खरिया जनजाति के सामाजिक, साँस्कृतिक जीवन को इस जनजातियों ने प्रभावित किया है।

 

2.   उपरोक्त प्रभावों के कारण सबरिया जनजाति की वर्तमान संस्कृति और सामाजिक संगठन को पारम्परिक मौलिक सिद्धान्त नहीं माना जा सकता है।

 

3.   वाह्य सम्पर्क के कारण सबरिया जनजाति में समाज के साथ समीकरण की प्रक्रिया को बल मिला है।

 

आदिवासी क्षेत्रों में संचालित योजनाएँ:

जनजातियों के उत्थान के उद्देश्य से सरकार ने अक्टूबर 1999 से जनजातीय कार्य मंत्रालय का गठन किया है, जिसका प्रमुख उद्देश्य जनजातियों का समग्र विकास सुनिश्चित करना है। आदिवासी क्षेत्रों में संचालित कुछ प्रमुख योजनाएँ निम्नलिखित हैं:-

 

संवैधानिक प्रावधान:

ऽ   संविधान के 12 वें भाग के अनुच्छेद 275 के अनुसार केन्द्र सरकार राज्यों को जनजातीय कल्याण एवं उनके उचित प्रशासन के लिए विशेष धनराशि देगी।

 

ऽ   संविधान के अनुच्छेद 16(4) तथा 335 के अनुसार सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी नौकरियों में जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने का अधिकार राज्य को दिया गया है।

 

ऽ   संविधान के भाग- 4 के अनुच्छेद 46 में जनजातियों की शिक्षा की उन्नति के लिए तथा आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए विशेष ध्यान देना राज्य का कर्तव्य माना गया है।

 

ऽ   संविधान की पाँचवीं अनुसूची पैरा (4) के अधीन अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन की व्यवस्था हेतु एक आदिवासी सलाहकार समिति के गठन का प्रावधान किया गया है।

 

निष्कर्ष:

सबरिया जाति के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए इन्हें शिक्षित होना अत्यन्त आवश्यक है। सबरिया जाति में जन्म, मृत्यु से संबंधित धार्मिक विश्वास, बलि प्रथा, विवाह में दहेज का प्रचलन होना, व्रत त्यौहार में धार्मिकता, लोकगीत, लोक कहावत एवं लोककथा में उनकी प्राचीन संस्कृति की झलक तथा प्रधानता आज भी है। अनुसूचित जनजातियों के जीवन के बदलते प्रतिमान एवं अनुसूचित क्षेत्रों में संचालित योजनाओं में आमूल-चूल परिवर्तन की आज भी आवश्यकता है। उसके पश्चात् ही जनजाति विकास की मुख्य धारा से जोड़ सकते हैं। उनके जीवन प्रतिमान में परिवर्तन कागजी रूप से करने से नहीं होगा। प्रायोकिग रूप से करने की आवश्यकता है, तभी जनजाति विकास सम्भव है।

 

संदर्भ ग्रंथ:

1.   बघेल, अनुसुईया जनजाति रायपुर जिले के गरियाबंद विकासखण्ड के जनजातियों का एक प्रतीकात्मक अध्ययन, राष्ट्रीय संगोष्ठी, विज्ञान एवं तकनीकी परिषद्, भोपाल, 22-23 नवम्बर 1991, 53-60

2.   ैीतपअंेजंअए ।ण्त्ण्छण् ष्डवअपदह ूीममसे व िउंबीपदमष् ज्ीम पउचंबज व िप्दकनेजतपंसप्रंजपवद पद जीम ठंेजंतण् ज्तपइंस तमहपवद व िब्मदजतंस प्दकपंए उंद ंदक  सपमि अवसण् 14ए छवे 3 ंदक 4 श्रनसल क्मबण् 1988 च्ंहम च् 135ण्

3.   शाह, घनश्याम इकोनाॅमिक डिफरेन्सिएशन एण्ड ट्राइवल्स आइडेन्टिटी: एरियसटेडी आॅफ रिजनल ट्राइब्स न्यू देहली, अजन्ता पब्लिकेशन 1984 पृष्ठ 130

4.   मंगल रमेश चन्द्र मीणा जनजाति के उभरते मध्यम वर्ग के प्रतिमान

 

 

 

Received on 03.06.2015       Modified on 02.08.2015

Accepted on 09.09.2015      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 3(3): July- Sept., 2015; Page 118-120